सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के तीसरी तिमाही के नतीजे आ चुके हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था इस तिमाही में चीन को पछाड़ दुनिया में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन चुकी है. दिसंबर तिमाही में भारत की जीडीपी दर 7.2 फीसदी रही. यह चीन की 6.8 फीसदी से ज्यादा है. इन आंकड़ों पर अर्थशास्त्रियों की अलग-अलग राय भी आने लगी है. नोटबंदी और जीएसटी के बाद देश के कुछ बडे़ अर्थशास्त्रियों ने जीडीपी में लगभग दो फीसदी की गिरावट का दावा किया था. अब स्थिति कुछ और है. वैसे, 2017-18 की पहली तिमाही और दूसरी तिमाही में जीडीपी के आंकड़े नोटबंदी और जीएसटी के प्रभाव को सही साबित कर रहे थे.
पहली तिमाही में जीडीपी की दर 5.7 फीसदी और दूसरी तिमाही में 6.5 फीसदी रही थी. यह और बात है कि तीसरी तिमाही में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के अच्छे प्रदर्शन ने जीडीपी को बल दिया. जब जीडीपी के आकड़े आते हैं तो अक्सर चर्चा होने लगती है कि आखिर ये जीडीपी क्या होती हैॽ किसी भी अर्थव्यवस्था में यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैॽ पूरी दुनिया इसके उतार-चढ़ाव को लेकर इतना उत्साहित क्यों रहती हैॽ
आखिर अर्थव्यवस्था में विकास की पूरी परिभाषा इसके इर्दगिर्द ही क्यों घूमती हैॽ जीडीपी बढ़ी तो अर्थव्यवस्था मजबूत और घटी तो चिंता शुरू. ऐसे ढेरों सवाल हैं जो जीडीपी को लेकर उठते रहते हैं. ये लोगों की कौतूहल का विषय होते हैं.
अर्थशास्त्र के इतिहास में जीडीपी कोर्इ बहुत पुरानी आर्थिक घटना नहीं है. यह हाल फिलहाल की आर्थिक घटना है. इसका पूरा श्रेय अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुलजेट को जाता है. उन्होंने 1937 में इसका इस्तेमाल किया था. धीरे-धीरे पूरे विश्व ने जीडीपी को आर्थिक सेहत मापने का पैमाना बना लिया. भारत भी जीडीपी को 1950 से अर्थव्यवस्था में पैमाने के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. इसकी गणना हर तिमाही की जाती है. जीडीपी एक तय समय में किसी देश में उत्पादित सभी वस्तुओं, उत्पादों और सेवाओं का कुल बाजार मूल्य है. इसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था के आकार और देश की अर्थव्यवस्था में कुल समग्र विकास या गिरावट को मापने के लिए किया जाता है.
वैसे, जीडीपी के आंकड़ों पर विवाद भी होता है. सामाजिक अर्थशास्त्री इन आंकड़ों की कड़ी आलोचना करते हैं. दुनिया के कर्इ बडे़ अर्थशास्त्री जीडीपी में वृद्धि को दूसरे तरीकों से परिभाषित करतें हैं. इनके अनुसार जीडीपी केवल उपभोग, निवेश, सरकारी खर्च और कुल शुद्ध निर्यात के योग के अलावा और कुछ नहीं है. जब जीडीपी के आकड़ों में सामाजिक विकास, मानव पूंजी और जीवनस्तर जैसी प्रमुख बातों को शामिल नहीं किया जाता है तो फिर जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का पैमाना कैसा हो सकती हैॽ वह भी तब जब पूरी दुनिया समावेशी विकास की बात कर रही हो.
यह सच है कि जीडीपी की दर ही किसी देश के विकास की परिभाषा नहीं तय कर सकती है. उदाहरण के रूप में भारत की जीडीपी दर भले ही पूरे विश्व में सबसे तेज हो गर्इ हो, पर 2017 के विश्व हंगर इंडेक्स में भारत 119 देशों की सूची में 100वें स्थान पर था. भारत की प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी की दर वित्त वर्ष 2017-18 में 5.3 फीसदी रहने की उम्मीद जताई गर्इ है. यह पिछले वित्त वर्ष में 5.7 फीसदी से कम है. जब प्रति व्यक्ति आय की दर बढ़ नहीं रही तो फिर जीडीपी दर में वृद्धि का क्या फायदाॽ
जीडीपी के आंकड़े तो बढ़ रहे हैं, पर साथ में जनसंख्या और महंगाई की दर को भी देखना चाहिए कि वह जीडीपी की तुलना में किस दर से बढ़ रही हैॽ फिलहाल ये सवाल तो खड़ा होता ही है कि आखिर जीडीपी की दर ही सब कुछ कैसे हो सकती हैॽ
विक्रांत सिंह (संस्थापक एवं अध्यक्ष, फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स थिंक काउन्सिल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी )
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