गाँवों में कोहराम मचाता कोरोना।

भारत के ज़्यादातर ग्रामीण क्षेत्र अब पूरी तरह से कोरोना की चपेट में हैं। पिछले वर्ष जब कोविड-19 ने भारत में दस्तक दी थी तब देश के ज़्यादातर गाँव इससे बच गए थे, लेकिन कोरोना की वर्तमान सुनामी ने इस बार ग्रामीण जनसंख्या पर वज्र जैसा प्रहार किया है। पहले से लचर स्वास्थ्य व्यवस्था, संकुचित आर्थिक संसाधन, अशिक्षा, जागरूकता की कमी, टेस्टिंग की ख़राब व्यवस्था और वैक्सीन पर संशय ने इस लड़ाई को और विकराल बना दिया है। वर्तमान में ग्रामीण भारत चर्चा का विषय दो महत्वपूर्ण कारणों की वजह से बना हैं। पहला, आज भी देश की 65 फ़ीसदी आबादी गाँव में रहती है और दूसरा, कोरोना की जिस मार को दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहर बर्दाश्त नहीं कर पाये क्या ये ग्रामीण क्षेत्र उससे लड़ पायेंगे?

असंगठित टेस्टिंग व्यवस्था होने के कारण ज़्यादातर लोग टेस्ट कराने जाते ही नहीं और जो लोग बहुत हिम्मत करके टेस्ट कराने जाते भी है वो वहाँ पर लंबी कतारों से घबराकर वापस लौट आते है। अगर उसके बाद भी कोई उन लाइनों में दिन भर खड़े रह कर टेस्ट कराने में सफल भी होता है तो आरटीपीसीआर की रिपोर्ट 7- 10 दिनों में आती है और तब तक मरीज़ को काफ़ी नुक़सान हो चुका रहता है। गाँव में कोरोना के तेज़ी से बढ़ते मामलों के बावजूद अभी भी अधिकतर ग्रामीण लोग कोरोना के लक्षण होने पर भी इसे स्वीकारने को तैयार नहीं है। वहीं दूसरी ओर कोरोना और टायफाइड मैं एक समान लक्षण होने के कारण गांवों में भ्रम का माहौल बना हुआ है। इसके अतिरिक्त कोरोना के लक्षण मिलने पर लोगों को विशेषज्ञों की सलाह के अभाव में अपने नज़दीकी मेडिकल स्टोर पर निर्भर होना पड़ता है। टेली मेडिसिन बिन तारों के खम्बे जैसी व्यवस्था के अंग तक सीमित रह गया है।

कोविड के बढ़ते और घटते आंकड़ों के बीच की बड़ी सच्चाई यह है कि इन आंकड़ों में सिर्फ़ वही लोग दर्ज होते हैं जो स्वेच्छा से अपनी कोरोना जाँच कराते हैं या जिन तक सरकारी तंत्र पहुँच पाता है। और यह सबको विदित है कि देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन दोनों से बहुत दूर बसता है।

कोविड से चल रही लड़ाई इसलिए भी ख़तरनाक दिखाई पड़ती है क्योंकि आज़ादी के 74 वर्ष बाद भी गांधीजी के सपनों का ग्रामीण भारत बहुत सी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। शायद यहीं कारण है की वर्तमान सरकारी कोरोना जाँच प्रोटोकॉल बिल्कुल अन्य सरकारी योजनाओं की तरह दिखाई देते हैं – वास्तविकता से कोसों दूर। सरकारी आंकड़ों में कोरोना के केसों में तेज़ी से कमी आ रही है पर गंगा में बहती लाशें सरकार के इस दावे को सिरे से ख़ारिज करती है। लाशें झूठ नहीं बोलती।

पहले पंचायती राज चुनावों में और अब शादी समारोह में आतिशबाज़ी के साथ सरकार की कोरोना गाइडलाइन की धज्जियाँ  उड़ रही है। जिस तरीक़े से ग्रामीण क्षेत्रों में वैवाहिक कार्यक्रमों में भीड़ उमड़ रही है उससे यह स्पष्ट है कि सरकार और जनता में संवाद की भारी कमी है।  जागरूकता के अभाव, सरकारी तंत्र की खामियों और अव्यवस्था के कारण जब परिवार के एक- एक सदस्य दम तोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं तब गांवों से जो शोर निकल रहा है उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों से जो कोलाहल उठ रहा है उसने सबको स्तब्ध कर दिया है। आरोप- प्रत्यारोप के बीच का सबसे बड़ा सच ये है कि ये स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत नहीं है।

अब समय की माँग यह है कि सरकार टेस्ट, ट्रेस और ट्रीट की नीति को और गति देने की आवश्यकता है। वही दूसरी ओर प्रभावशाली नियोजन से सीमित संसाधनो में ग्रामीणों को लगातार जागरूक करना होगा और टीकाकरण के लिए सामुदायक स्वास्थ्य केंद्रो, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी, एनजीओ आदि के सहयोग से इसे सुचारु ढंग से किया जा सकता है। सनद रहे कि इन गाँव के लोगों ने ही शहर को बसाने में अपना खून पसीना बहाया है। अब समय आ गया है जब शहर इन्हें इस महामारी से बचाने के लिए आगे आये।

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