
राजस्थान में 6 वर्षीय बालिका की दुखद मृत्यु हो जाना तथा उसकी नानी का जल के अभाव में बेहोश होना, एक बार फिर भारत में आने वाली एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा कर रहा है। आज हम एक ऐसी स्थिति से जूझ रहे हैं जहां हमें इसका निर्धारण करना है कि जल प्रबंधन के लिए हमारी नीति क्या होगी? नहीं तो जल प्रबंधन तथा जल संरक्षण के अभाव में अर्थव्यवस्था तथा कृषि पर संकट तो आएगा ही अपितु मानव जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। हाल ही में राजस्थान की 6 वर्षीय बच्ची का पानी के अभाव में निधन हो जाना, इस समस्या की ओर इंगित करता है।
देश के अधिकांश हिस्सों में जल संकट एक विकराल समस्या है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा तथा कर्नाटक जैसे राज्य सूखे की त्रासदी झेल रहे हैं। राजस्थान में पीने के पानी का संकट खड़ा है तो अन्य राज्यों में सिंचाई तथा फैक्ट्री में उपयोग हेतु पानी की समस्या है। कृषि मंत्रालय की वर्ष 2014-15 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में बोई गई फसल का कुल रकबा 14.08 करोड़ हेक्टेयर था, वहीं सिंचित जमीन केवल 6.53 करोड़ हेक्टेयर थी। यानी 7.55 करोड़ हेक्टेयर जमीन असिंचित थी। यहां देश के नीति-निर्धारकों को ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जबकि वे अपनी राजनीति में ही व्यस्त हैं।
राजस्थान में 6 वर्षीय बालिका की मृत्यु के मामले में बीजेपी ने कांग्रेस नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार पर निशाना साधा किंतु वे भूल गए कि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों तथा बुंदेलखंड में सूखे ने हाहाकार मचाया हुआ है, जबकि वहां उन्हीं की सरकार है। इस समय सभी नेताओं और पार्टियों को सियासी रोटियां सेकना बंद करके जल संकट पर विचार करना चाहिए। यह भारत का ही नहीं अपितु वैश्विक महत्व का मुद्दा है। जल संरक्षण पर गंभीर विचार ना करने का ही दुष्परिणाम है कि इजराइल से 40 से० मी० वर्षा वाले देश में जल का कोई अभाव नहीं है, जबकि भारत जैसे भारी वर्षा वाले देश में सूखे की स्थिति है।
भारत में जल संकट का प्रमुख कारण सरकारी नियोजन व नीतियों की कमी, उद्योगों का निजीकरण,औद्योगिक तथा मानव अपशिष्ट, भ्रष्टाचार एवं अनुचित जल दोहन है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2050 तक भारत में जल की समस्या और अधिक विकराल होने वाली है क्योंकि वर्ष 2050 तक भारत की जनसंख्या 1.6 बिलियन होने का अनुमान है।
धरती के दर्द से किसानों से लेकर उद्योग तक बदहाल-
वर्षा व मानसून के समय हमारे देश के अधिकांश इलाके बाढ़ से जूझते हैं, उसके बाद वर्ष भर सूखे की त्रासदी से। अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि दोनों के कारण किसानों की दशा बदहाल है। वर्ष 2010 में बाढ़ के कारण कुल 19,490 करोड रुपए की क्षति हुई, जिसमें 1393.85 करोड रुपए की फसल का नुकसान हुआ था। (स्रोत-केन्द्रीय जल समिति)
जल के कुप्रबंधन का सबसे बड़ा प्रतिकूल प्रभाव कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2010 में 15,986 किसानों ने आत्महत्या की थी और वर्ष 2014 में 12,307 किसानों ने आत्महत्या की थी। किसानों की आत्महत्या के प्रमुख कारणों में (एनएएसओ के अनुसार) प्राकृतिक आपदा जैसे सूखे के कारण फसल नष्ट होना, दिवालियापन आदि प्रमुख कारण हैं। सूक्ष्म अध्ययन करें तो पता चलता है कि दिवालियापन का कारण भी फसल नष्ट होना ही है जो कि जलसंकट अथवा बाढ़ के कारण होता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 500 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) जल का उपयोग कारखानों में किया जाता है। 10 बीसीएम जल का उपयोग प्रसंस्करण कारखानों (प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज) तथा 30 बीसीएम जल का उपयोग प्रशीतन(रेफ्रिजरेशन) के लिए किया जाता है। जल का उपयोग मुख्यतः गारमेंट तथा टैक्सटाइल इंडस्ट्री में डाइंग तथा धुलाई आदि के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा पैट्रोलियम रिफायनरी, रासायनिक उत्पादों व उर्वरक के कारखानों, तथा कागज की फैक्ट्रियों में पानी का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। जल के अभाव में भारतीय उद्योगों पर बहुत बड़ा दुष्प्रभाव पड़ सकता है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था अस्त व्यस्त हो सकती है। जल संकट के कारण उद्योगों में कमी, लागत दर में वृद्धि, लाभ में कमी, जीडीपी में गिरावट, विकास दर में कमी तथा प्रति व्यक्ति आय में कमी हो सकती है।
वर्तमान में केंद्र तथा राज्य सरकारों को जल प्रबंधन के प्रति सजग होकर एक नीति तैयार करनी होगी तथा उसी के तहत कार्य करके जल प्रबंधन को भारत में सुदृढ़ एवं सुनिश्चित करना होगा। समस्या का हल जनजागरण ही है, अतः सरकार को विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों के द्वारा जनता को जल प्रबंधन तथा जल के बचाव के प्रति सजग करना होगा।