FETC Analysis · Women and Work
डिग्री से नौकरी तक: कहां टूट रही है महिलाओं की रोजगार श्रृंखला
भारत ने महिलाओं की उच्च शिक्षा में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब चुनौती उस शिक्षा को सम्मानजनक, उत्पादक और टिकाऊ रोजगार में बदलने की है।
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के खोरी गांव की एक लड़की ने बी.एससी. किया, फिर बी.एड. की डिग्री हासिल की। इसके बाद उसने दो वर्षों तक शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी की। सरकारी नौकरी नहीं मिली। एक निजी विद्यालय ने नौकरी का प्रस्ताव दिया, लेकिन वेतन मात्र आठ हजार रुपये प्रतिमाह था, न कोई भविष्य निधि, न कोई सामाजिक सुरक्षा। परिवार भी चाहता है कि कम आय वाली अस्थायी नौकरी करने से बेहतर है कि समय पर शादी हो जाए।
यह सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं, बल्कि उस बड़ी आर्थिक खाई की तस्वीर है जो भारत में महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के बीच बनती जा रही है। भारत ने लड़कियों को स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लेकिन अब असली चुनौती शिक्षा तक पहुंच नहीं, बल्कि उस शिक्षा को सम्मानजनक, उत्पादक और टिकाऊ रोजगार में बदलने की है। यही भारत के विकास मॉडल का नया विरोधाभास है। हम महिला मानव पूंजी तैयार तो कर रहे हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसका पूरा उपयोग नहीं कर पा रही।
डिग्री बढ़ी, लेकिन रोजगार का रास्ता उतना नहीं
शिक्षा के मोर्चे पर तस्वीर वास्तव में उत्साहजनक है। जुलाई 2026 में जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE 2023-24) के अनुसार, उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 2.24 करोड़ हो गया। यानी एक दशक में लगभग 42 प्रतिशत की वृद्धि। महिला सकल नामांकन अनुपात (GER) भी 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 31.2 प्रतिशत हो गया है। यह पुरुषों के 28.9 प्रतिशत से अधिक है। उच्च शिक्षा का जेंडर पैरिटी इंडेक्स भी 2014-15 के 0.92 से बढ़कर 2023-24 में 1.08 हो चुका है। यानी कॉलेज और विश्वविद्यालय तक पहुंच के स्तर पर महिलाएं अब पुरुषों से पीछे नहीं हैं। पीएच.डी. में भी 2023-24 में करीब 1.71 लाख महिलाएं नामांकित थीं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) विषयों में महिला हिस्सेदारी 44 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। उच्च शिक्षा में महिला शिक्षकों की संख्या भी 7.78 लाख हो गई है। ये छोटी उपलब्धियां नहीं हैं। इनका अर्थ है कि भारत ने पिछले दशक में महिला मानव पूंजी का विशाल आधार तैयार किया है। लेकिन आर्थिक दृष्टि से शिक्षा में निवेश का वास्तविक प्रतिफल तभी मिलता है जब उससे उत्पादकता, आय और श्रम बाजार में भागीदारी बढ़े। यहीं तस्वीर बदलने लगती है।
श्रम भागीदारी बढ़ी, लेकिन किस तरह का रोजगार?
PLFS 2025 के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 40 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों के लिए यह दर 79.1 प्रतिशत रही। सरल शब्दों में कहें तो 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की हर 100 महिलाओं में केवल 40 महिलाएं श्रम बल का हिस्सा थीं, जबकि पुरुषों में यह संख्या करीब 79 थी। यानी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी अब भी लगभग आधी है। सुधार के बावजूद दोनों के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है। महिला वर्कर पॉपुलेशन रेश्यो (WPR), यानी कुल महिला आबादी में काम कर रही महिलाओं का अनुपात, भी केवल 38.8 प्रतिशत था। हालांकि, इन राष्ट्रीय आंकड़ों के भीतर ग्रामीण और शहरी भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाई देती हैं।
ग्रामीण महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 45.9 प्रतिशत थी, जबकि शहरी महिलाओं के लिए यह केवल 27.7 प्रतिशत रही। रोजगार में लगी महिलाओं का अनुपात भी ग्रामीण क्षेत्रों में 44.9 प्रतिशत था, जबकि शहरों में यह केवल 25.9 प्रतिशत था। पहली नजर में इन आंकड़ों से ऐसा लग सकता है कि ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए रोजगार की स्थिति शहरों की तुलना में बेहतर है। लेकिन केवल अधिक महिलाओं का काम में होना पूरी तस्वीर नहीं बताता। रोजगार की संख्या और रोजगार की गुणवत्ता दो अलग-अलग बातें हैं।
2025 में कामकाजी महिलाओं में 64.2 प्रतिशत स्वरोजगार में थीं, जबकि केवल 18.2 प्रतिशत नियमित वेतनभोगी रोजगार में थीं। पुरुषों में नियमित वेतनभोगी रोजगार की हिस्सेदारी 26.5 प्रतिशत थी। ग्रामीण महिलाओं के मामले में यह अंतर और भी बड़ा था। वहां 70.7 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं स्वरोजगार में थीं और केवल 9.3 प्रतिशत नियमित वेतनभोगी रोजगार में। इसके उलट, शहरी कामकाजी महिलाओं में नियमित वेतनभोगी रोजगार की हिस्सेदारी 50.9 प्रतिशत थी। यही वह बिंदु है जहां महिलाओं की बढ़ती श्रम बल भागीदारी को थोड़ी सावधानी से समझने की जरूरत है। स्वरोजगार अपने-आप में खराब रोजगार नहीं है। सफल उद्यमिता भी स्वरोजगार का ही हिस्सा है। लेकिन स्वरोजगार की प्रकृति भी महत्वपूर्ण है। 2025 में कुल महिला कामगारों में 28.3 प्रतिशत पारिवारिक उद्यमों में सहायक के रूप में काम कर रही थीं। इसलिए केवल यह कहना कि महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ रही है, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। यह भी देखना जरूरी है कि वे किस तरह के रोजगार में हैं और उससे उन्हें कितनी आय हो रही है।
कमाई के आंकड़े इस अंतर को और स्पष्ट करते हैं। 2025 में नियमित वेतनभोगी पुरुषों की औसत मासिक कमाई ₹24,217 थी, जबकि महिलाओं की ₹18,353, यानी लगभग 24 प्रतिशत कम। स्वरोजगार में यह अंतर कहीं अधिक था। स्वरोजगार से पुरुषों की औसत मासिक कमाई ₹17,914 थी, जबकि महिलाओं की केवल ₹6,374। यहां एक सावधानी जरूरी है। इन आंकड़ों का यह अर्थ नहीं है कि समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 24 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। महिलाओं और पुरुषों के पेशे, कार्यक्षेत्र, काम के घंटे, अनुभव और रोजगार के प्रकार में अंतर हो सकता है। इसलिए इन आंकड़ों से सीधे समान काम के लिए वेतन में भेदभाव का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
लेकिन औसत कमाई में इतना बड़ा अंतर एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है। यह बताता है कि महिलाएं और पुरुष श्रम बाजार में एक जैसी स्थिति में नहीं हैं और न ही समान प्रकार के रोजगारों में उनकी मौजूदगी बराबर है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी महिलाएं काम कर रही हैं। असली सवाल यह भी है कि वे कहां काम कर रही हैं, किस तरह का काम कर रही हैं, उससे कितनी कमाई कर रही हैं और उनका रोजगार कितना स्थायी है।
भारत ने महिला मानव पूंजी का विशाल आधार तैयार किया है, लेकिन शिक्षा में निवेश का वास्तविक प्रतिफल तभी मिलता है जब उससे उत्पादकता, आय और श्रम बाजार में भागीदारी बढ़े।
शिक्षा से रोजगार तक की अधूरी यात्रा
यहीं भारत की शिक्षा और रोजगार नीति के बीच एक खाई है। एक ओर उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात (GER) पुरुषों से आगे निकल चुका है। STEM शिक्षा में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर 44 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। IIT और NIT जैसे संस्थानों में सुपरन्यूमेरेरी सीटों की व्यवस्था के बाद महिला नामांकन में बढ़ोतरी हुई है। IIT में सुपरन्यूमेरेरी सीटों की व्यवस्था के बाद महिला नामांकन 2016 के 8 प्रतिशत से बढ़कर 2021-22 में 20 प्रतिशत हो गया। NIT में भी 2021-22 तक छात्राओं की हिस्सेदारी लगभग 22.1 प्रतिशत पहुंच गई थी। लेकिन दूसरी ओर, कॉलेज से रोजगार तक महिलाओं की पूरी यात्रा को राष्ट्रीय स्तर पर नियमित और व्यवस्थित रूप से ट्रैक करने वाली तस्वीर अब भी अधूरी है।
हम जानते हैं कि कितनी छात्राएं उच्च शिक्षा में दाखिला ले रही हैं और कितनी अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं। हमें यह भी पता है कि कितनी महिलाएं श्रम बाजार का हिस्सा हैं। लेकिन इन दोनों सिरों के बीच क्या होता है, इसकी तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं है। कितनी छात्राओं को इंटर्नशिप मिली, कितनी को कैंपस प्लेसमेंट मिला, कितनी पहली नौकरी तक पहुंचीं, कितनी एक वर्ष बाद भी रोजगार में बनी रहीं और कितनी विवाह, मातृत्व या देखभाल की जिम्मेदारियों के कारण श्रम बाजार से बाहर हो गईं, इन सवालों पर राष्ट्रीय स्तर की नियमित और समेकित जानकारी सीमित है। यही वह जगह है जहां शिक्षा से रोजगार तक की पाइपलाइन कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
अगर किसी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की शिक्षा लगातार बढ़ रही हो, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा रोजगार और उत्पादक आर्थिक भागीदारी में न बदल पाए, तो इसका नुकसान केवल परिवार की आय तक सीमित नहीं रहता। शिक्षा पर परिवार और सरकार द्वारा किया गया निवेश अपनी पूरी आर्थिक क्षमता हासिल नहीं कर पाता। अर्थव्यवस्था कुशल श्रम का उपयोग नहीं कर पाती, आय और कर आधार के विस्तार की संभावना सीमित होती है और संभावित उत्पादकता का एक हिस्सा अप्रयुक्त रह जाता है।
तीन बाधाएं जिन्हें डिग्री अकेले दूर नहीं कर सकती
पहली बाधा: स्थान और गतिशीलता
डिग्री किसी महिला को नौकरी के योग्य बना सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर उपलब्ध नौकरी उसके लिए वास्तव में सुलभ भी हो। सुरक्षित और नियमित परिवहन, कार्यस्थल के पास किफायती आवास, परिवार से दूर रहने की सामाजिक स्वीकृति और काम के घंटे, ये सभी तय करते हैं कि किसी महिला के लिए रोजगार के वास्तविक अवसर कितने हैं। इसलिए छोटे शहर की किसी स्नातक महिला के सामने समस्या हमेशा योग्यता या नौकरी की कमी नहीं होती। कई बार नौकरी उपलब्ध होती है, लेकिन वह ऐसी जगह या ऐसी परिस्थितियों में होती है जहां उसके लिए उसे स्वीकार करना आसान नहीं होता।
दूसरी बाधा: देखभाल और घरेलू काम का असमान बोझ
यह केवल सामाजिक अनुभव नहीं है, सरकारी आंकड़े भी इसे साफ दिखाते हैं। टाइम यूज सर्वे 2024 के अनुसार, 15 से 59 वर्ष की वे महिलाएं जो अवैतनिक घरेलू काम करती थीं, उन्होंने इस काम पर औसतन 305 मिनट यानी पांच घंटे से अधिक प्रतिदिन खर्च किए। अवैतनिक देखभाल के काम में भाग लेने वाली महिलाएं प्रतिदिन औसतन 140 मिनट देती थीं, जबकि पुरुष 74 मिनट। PLFS 2025 में भी श्रम बल से बाहर महिलाओं में 44.4 प्रतिशत ने बच्चों की देखभाल या घर-गृहस्थी से जुड़ी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को इसका मुख्य कारण बताया। इसका आर्थिक अर्थ सीधा है। किसी महिला के लिए नौकरी का वेतन ही यह तय नहीं करता कि नौकरी करना उसके लिए फायदेमंद है या नहीं। उसे आने-जाने का खर्च, बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल की व्यवस्था, घर से बाहर बिताया जाने वाला समय और इससे जुड़ी दूसरी सामाजिक तथा पारिवारिक लागत भी देखनी पड़ती है। यदि आठ या दस हजार रुपये की नौकरी के लिए रोज लंबी यात्रा करनी पड़े, बच्चों की देखभाल के लिए अलग व्यवस्था करनी पड़े और घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ भी जस का तस बना रहे, तो वह नौकरी आर्थिक रूप से भी कम आकर्षक हो सकती है।
तीसरी बाधा: नियोक्ता की धारणाएं
अर्थशास्त्र में इसे कई बार ‘सांख्यिकीय भेदभाव’ (statistical discrimination) के रूप में समझाया जाता है। इसका अर्थ है कि जब नियोक्ता के पास किसी उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती, तो वह कभी-कभी उसकी व्यक्तिगत क्षमता के बजाय उस समूह से जुड़ी सामान्य धारणाओं के आधार पर फैसला कर सकता है। महिलाओं के मामले में विवाह, मातृत्व, लंबी छुट्टी या करियर में रुकावट की आशंका ऐसी धारणाओं का हिस्सा बन सकती है। इसका असर हमेशा खुला या प्रत्यक्ष नहीं होता। यह भर्ती में कम प्राथमिकता, प्रशिक्षण के कम अवसर, महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने में देरी या पदोन्नति की धीमी गति के रूप में भी दिखाई दे सकता है। यदि कुछ महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वास्तव में नौकरी छोड़ती हैं, तो इससे नियोक्ता की पहले से बनी धारणा और मजबूत हो सकती है। इस तरह एक दुष्चक्र पैदा हो सकता है।
अब केवल नामांकन नहीं, परिणाम मापिए
पहला बदलाव कॉलेज और नौकरी के बीच की कड़ी को मजबूत करने में होना चाहिए। उच्च शिक्षा पर हमारे पास नामांकन, परीक्षा परिणाम और अब प्लेसमेंट से जुड़ी कुछ जानकारी भी उपलब्ध है। लेकिन अगला कदम इससे आगे जाने का होना चाहिए। AISHE जैसी राष्ट्रीय व्यवस्था में धीरे-धीरे लिंग के आधार पर इंटर्नशिप, प्लेसमेंट, पहली नौकरी और 12 महीने बाद रोजगार में बने रहने जैसे परिणामों को भी व्यवस्थित रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। इससे यह बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा कि शिक्षा से रोजगार तक की यात्रा में महिलाएं आखिर किस चरण पर पीछे छूट रही हैं।
महिलाओं की रोजगार नीति को देखभाल नीति से अलग नहीं किया जा सकता। क्रेच, भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षित कार्यस्थल, जहां संभव हो वहां निश्चित और पूर्वानुमेय काम के घंटे, तथा करियर में विराम के बाद नौकरी पर लौटने के रास्ते कोई अतिरिक्त सुविधाएं नहीं हैं। ये ऐसे आर्थिक बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं जो यह तय करते हैं कि महिलाएं श्रम बाजार में प्रवेश कर पाएंगी और उसमें बनी रह पाएंगी या नहीं।
नियोक्ताओं की जवाबदेही केवल महिलाओं की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बड़ी कंपनियों में महिलाओं और पुरुषों की नियुक्ति, वेतन श्रेणियों, पदोन्नति और नौकरी छोड़ने की दर से जुड़ी जानकारी अधिक पारदर्शी बनाई जा सकती है। यदि सरकार कंपनियों को रोजगार प्रोत्साहन देती है, तो उसे केवल महिला की नियुक्ति से जोड़ने के बजाय इस बात से भी जोड़ा जा सकता है कि वह महिला कितने समय तक रोजगार में बनी रही और उसके करियर में वास्तविक प्रगति हुई या नहीं।
उस लड़की का क्या होगा?
देवरिया की वह बी.एससी. और बी.एड. कर चुकी लड़की केवल बेरोजगारी का एक आंकड़ा नहीं है। संभव है कि वह PLFS में बेरोजगार के रूप में दर्ज भी न हो। यदि उसने नौकरी की तलाश छोड़ दी है और अब काम के लिए उपलब्ध नहीं है, तो उसे श्रम बल से बाहर माना जाएगा। यही वजह है कि महिलाओं की कम बेरोजगारी दर को अपने-आप में अच्छी खबर नहीं माना जा सकता। उसकी कहानी के भीतर भारत की एक बड़ी आर्थिक चुनौती छिपी है। हमने उसे स्कूल भेजा, कॉलेज तक पहुंचाया और डिग्री हासिल करने का अवसर दिया। उसकी शिक्षा पर परिवार ने पैसा खर्च किया और सरकार ने भी संस्थानों तथा सार्वजनिक संसाधनों में निवेश किया। लेकिन यदि उसके आसपास ऐसा रोजगार उपलब्ध नहीं है जो उसके कौशल, आय की अपेक्षाओं और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से मेल खाता हो, तो उसकी शिक्षा की आर्थिक क्षमता पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।
भारत का अगला लक्ष्य इसलिए केवल इतना नहीं होना चाहिए कि अधिक लड़कियां कॉलेज जाएं। यह लक्ष्य जरूरी है, लेकिन अब पर्याप्त नहीं है। अगली बड़ी छलांग तब आएगी जब कॉलेज से निकलने वाली महिला के हाथ में केवल डिग्री नहीं, बल्कि उस डिग्री को काम और आय में बदलने का वास्तविक अवसर भी होगा। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था अपनी महिलाओं को शिक्षित तो करती है, लेकिन उनकी प्रतिभा और कौशल को उत्पादक रोजगार में नहीं बदल पाती, वह केवल महिलाओं के अवसर नहीं खोती। वह अपनी ही तैयार की हुई मानव पूंजी के एक बड़े हिस्से का पूरा उपयोग नहीं कर पाती।
डेटा संदर्भ: AISHE 2023-24, PLFS 2025 और टाइम यूज सर्वे 2024 के आंकड़ों का उपयोग लेख में किया गया है।
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